बच्चों में सुनने की क्षमता में कमी: कारण, लक्षण, इलाज

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बच्चों में सुनने की क्षमता : क्या होती है सुनने की शक्ति में कमी

जन्म से ही कुछ बच्चों में सुन पाने की शक्ति में कमी हो सकती है। यह कमी आंशिक या पूर्ण होती है। बच्चे या तो एक कान से (unilateral) या दोनों कानों से (bilateral) sun paane me असमर्थ होते हैं। डॉक्टर के अनुसार ये अक्षमता या तो कुछ निश्चित डेसिबल की आवाज सुनने में दिक्कत या फिर पूरी तरह बहरेपन के रूप में होती है।

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कितने प्रकार की होती है यह अक्षमता ( बच्चों में सुनने की क्षमता)

सुनने की असमर्थता कई तरह की हो सकती है। कभी कभी बच्चा हाई पिच यानी के ऊंची आवाज सुन पता है किंतु बहुत महीन आवाज नहीं सुन पाता। इसे मेडिकल भाषा में लो फ्रीक्वेंसी हियरिंग लॉस (low frequency hearing loss) कहते हैं, और कभी तो बहुत महीन यानी लो पिच आवाज सुन लेता है लेकिन ऊंची आवाज नहीं सुन पाता जिसे हाई फ्रीक्वेंसी हियरिंग लॉस (high frequency hearing loss) कहा जाता है।

कितनी पिच होती है सीमा ( बच्चों में सुनने की क्षमता)

डॉक्टर के अनुसार 15 से 20 डेसीबल सबसे नीचे की पिच होती है। पर अगर इसको सुनने में भी दिक्कत आए तो इसे समस्या माना जाता है। इसे डेसिबल के हिसाब से चार स्तर पर बांटा जाता है

  1. 20- 40 dB ना सुन पाना
  2. 41- 60 dB ना सुन पाना
  3. 61- 80 dB ना सुन पाना
  4. 80+ dB ना सुन पाना

क्या है कारण ( बच्चों में सुनने की क्षमता )

सुनने की क्षमता में कमी दो प्रमुख कारणों से होती है

  1. आनुवांशिक: आनुवांशिक कारण उम्र पर निर्भर नहीं करते। अगर परिवार में इस प्रकार की बीमारी का इतिहास है, तो यह अगली किसी भी पीढ़ी के किसी भी सदस्य को किसी भी आयु में हो सकती है।
  2. जन्मजात समस्याएं: समय से पहले जन्म के कारण सभी अंगों या तंत्रिका तंत्र का सही से विकास न हो पाना भी इसका एक प्रमुख कारण है। जन्म से पहले कुछ पोषक तत्वों की कमी या कोई दुर्घटना आदि भी इसके कारण हो सकते हैं।
  3. बाहरी कारण: अत्यधिक तेज आवाज के संपर्क में आने से यदि उनके श्रावण तंत्र को क्षति पहुंची हो। अथवा किसी धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के संपर्क में जन्मने पहले या बाद में बच्चा आए, तो वह भी एक बहुत घटक कारण होता है बच्चे में सुन पाने में असमर्थता का।

क्या क्या हो सकती हैं समस्याएं ( बच्चों में सुनने की क्षमता)

अगर बच्चे को सही से सुनाई देने में दिक्कत आती है तो कालांतर में उसके बोलने की क्षमता भी प्रभावित होती है। आखिर एक बच्चा जो सुनता है वही बोलता है। न सुन पाने की स्थिति में उसके बोलने में भी कमी आती है या ये क्षमता भी बिल्कुल ही विकसित नहीं होती।

इलाज का सही समय ( बच्चों में सुनने की क्षमता )

बच्चे की सुनने बोलने और प्रतिक्रिया देने की काबिलीयत का विकास चाह वर्ष की आयु तक हो जाता है। अतः जन्मजात अक्षमता को इस अवस्था तक आने के पहले ठीक कर लेना आवश्यक होता है। अन्यथा अन्य क्रियाओं पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

कैसे पहचानें जाते हैं लक्षण ( बच्चों में सुनने की क्षमता )

बच्चा अलग अलग आयु में अलग प्रकार की प्रतिक्रियाएं देता रहता है। जैसे जैसे उसकी बाहरी दुनिया को सीखने परखने की शक्ति बढ़ती है वो अलग अलग हाव भाव दर्शाता है। ऐसे में यदि उसे कुछ अंदरूनी समस्या आ रही है तो उसके लक्षण पहचानने की आवश्यकता होती है। सुनने की क्षमता में कमी के लक्षण अलग लगा आयु के बच्चों में इस प्रकार पहचानी जा सकती है:

  • जन्म से ले कर चार माह का बच्चा यदि तेज आवाज पर चौंके नहीं या आपकी आवाज पर प्रतिक्रिया ना दे।
  • चार से नौ महीने तक के बच्चे खिलौनों की आवाज न पहचानें। जाने पहचाने आवाजों पर प्रतिक्रिया ना दें। मुंह से कोई भी आवाज न निकलते हों।
  • नौ से पंद्रह महीने में अगर अपने नाम पर प्रतिक्रिया ना दे। अपनी बात बताने के लिए किसी भी प्रकार की ध्वनि न निकालें।
  • पंद्रह से चौबीस महीने में यदि छोटे छोटे शब्द न बोलें, संगीत या किसी धुन pe प्रतिक्रिया ना दें,  उनसे कही हुई बातें न समझें।

क्या क्या है इलाज ( बच्चों में सुनने की क्षमता )

मेडिकल साइंस की तारक्की के कारण आजकल इस बीमारी का इलाज संभव हो पाया है। डॉक्टर कई तरह की मशीनों का प्रयोग करते हैं जो बच्चे की बीमारी की गंभीरता के अनुसार होते हैं। कानों में मशीन लगाने समेत दवाएं आदि के द्वारा बच्चे की सहायता की जाती है।

उसके बाद भी ये बातें है जरूरी ( बच्चों में सुनने की क्षमता )

सुनने के लिए सहायता मिलने के बाद बच्चा जो सीखने में बाकी बच्चों से पीछे रह गया उसपर ध्यान दिया जाना जरूरी होता है। उसकी स्पीच थेरेपी अर्थात बोलने की क्षमता को विकसित करने के ऊपर काम होता है। इसके लिए किसी विशेषज्ञ की सहायता ली जाती है। कुछ साधारण वस्तुओं के नाम बताए जाते हैं। उसे अपना नाम बता कर पहचानने को सिखाया जाता है।

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